Friday, 9 May 2014

न्यू मीडिया पर एक नई किताब (New Book of New Media)

मेरे द्वारा सम्पादित एक और नयी पुस्तक... 2 वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद......
पुस्तक प्रकाशक के द्वारा जल्दी ही बाजार में उपलब्ध करवा दी जायेगी. इन्टरनेट की कई साइट्स पर बिकने के लिए भी यह उपलब्ध होगी. पूरी सूचना शीघ्र ही. फिलहाल तो प्रकाशक द्वारा व्यक्तिगत रूप से ही पुस्तक डाक द्वारा भेजने का प्रबंध किया गया है. आप भी चाहें तो अपने आदेश आवरण पर दिए ईमेल पर भेज सकते हैं या फिर मुझसे ईमेल द्वारा भी संपर्क कर सकते हैं. drharisharora@gmail.com


Wednesday, 18 July 2012

सरकार पहले अपनी फिजूलखर्ची बंद करे


राजीव गुप्ता 

 एम. बी. ए. , बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय की पढाई करने के उपरांत 
एक निजी कंपनी में कार्यरत राजीव के मन में  देश-समाज के लिए कुछ करने की ललक है , 
बस उसी ललक को पूरा करने की कशिश मन में लिए उनका एक चिंतनपरक लेख!!


    यूपीए की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने पिछले महीने अपनी सरकार की उपलब्धियों का "जनता के लिए रिपोर्ट 2011 -2012 "  मे लेखा - जोखा पेश करते हुए कहा था कि भारत में आर्थिक विकास दर अब तेजी के पथ पर है लेकिन इसका लाभ अभी हमारे लाखो गरीबो को पहुचना बाकी है ! परन्तु योजना आयोग ने  पिछले दिनों गरीबो के लिए आलीशान शौचालय बनवाकर सोनिया जी की इन बातो को झुठला दिया ! गौरतलब है कि योजना आयोग के मुताबिक रोजाना 28 रुपए से ज्यादा खर्च करने वाला गरीब नहीं है ! गरीबी की 'अनूठीपरिभाषा तय करने वाले योजना आयोग की "फिजूलखर्ची" का नमूना यह है कि उसने अपने  शौचालयों की मरम्मत पर ही 35 लाख रुपए खर्च कर  डाले ! सूचना अधिकार कानून (RTI) के तहत दाखिल एक अर्जी के जवाब से यह आंकड़ा सामने आया है ! हालांकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह इस बारे में अब सफाई दे रहे हैं कि यह रकम सिर्फ  शौचालयों पर खर्च नहीं की गई और यह खर्च सचमुच जरूरी था ! ध्यान देने योग्य है कि पिछले वर्ष अगस्त महीने में प्रधानमंत्री को इसी योजना आयोग ने  विकास दर बढ़ाने के मंत्र  दिए थे जिसमे से एक  प्रमुख मन्त्र सरकारी - खर्च को कम करने को लेकर था ! सरकारी खर्च कम करने के चलते और बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार द्वारा नयी नौकरियों पर रोक तक लगाने की बात कही गयी ! 

बढ़ती महगाई ने एक तरफ जहा आम आदमी का जीना दूभर कर रखा है तो वही दूसरी तरफ गिरती विकास दर ने भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है जिसकी पुष्टि अभी हाल में ही प्रधानमंत्री ने भी की ! दुनिया भर में आर्थिक बदहाली के चलते भारत सहित समूचा विश्व फिर से आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ रहा है ! आगे आने वाले दिन भारत के लिए बहुत ही कष्टदाई हो सकते है क्योंकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह दूसरा स्लोडाउन ज्यादा लंबा और गहरा हो सकता है ! फिर ऐसी हालत ऐसे समय आ रही हैजब भारत की अर्थव्यवस्था पहले से ही डगमगाई हुई है ! विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही हैसरकार कमजोर दिख रही है और उसका सारा लेखा - जोखा बिगड़ा हुआ है ! बाज़ार में रूपये की कीमत लगातार घाट रही है ! विदेशी निवेशक भाग रहे हैं और बिजनेस की उम्मीदें अंतिम सांस लेने के कगार पर है ! सभी अर्थशास्त्री अब एक सुर में सुर मिलाकर बोल रहे है कि ऐसी खस्ता हाल के लिए जिम्मेदार हमारी सरकार की अपनी गलतियां  हैजिसके लिए केवल दुनिया की खराब हवाओं को कसूरवार ठहराया जाना ठीक नहीं है ! परन्तु यूपीए की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी के अनुसार उनकी सरकार के कार्यक्रम न केवल लाभकारी है अपितु नीतिया भी सही है ! 

आर्थिक अपंगता की मार झेल रही अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए  बुधवार को  मनमोहन की अगुआई वाली यूपीए - सरकार ने पूर्व राजग सरकार की तर्ज पर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान केन्द्रित कर कुछ योजनाओं को हरी झंडी दिखाकर सरकार को "चलती हुई सरकार" के रूप में दिखाने की कोशिश की ! जिसमे रेलवे नागरिक विमाननसड़ककोयलाबिजली और बंदरगाह से सम्बंधित लगभग चार दर्जन योजनाये शामिल है ! ध्यान देने योग्य है कि पूर्व प्रधानमंत्री की अगुआई में वर्ष 2000 - 2001 में  तत्कालीन केंद्र सरकार ने सड़कबंदरगाह और उड्डयन क्षेत्र में निवेश बढ़कर अर्थव्यवस्था की रफ़्तार को तेजी से बढाया था ! इससे भारत के इत्मीनान और भरोसे की धाक जमी थी ! सही ठिकाने की तलाश में तड़प रही विदेशी पूंजी को यहां आने की हिम्मत हुई जिससे तत्कालीन सरकार की साख भी बढी  थी ! सरकार के इन फैसलों से अभी तक बदकिस्मती से ठप नजर आ रही सरकार थोड़ी खिसकती हुई दिखी ! अन्यथा  सरकार का अभी तक सारा ध्यान घोटालोंआंदोलनोंअसंतोष और सियासत पर ही था ! सरकार को अब इस आर्थिक बदहाली से बाहर आने के लिए उसे इन मुद्दों को निपटाकर अपनी बची-खुची साख बचानी चाहिए !

वित्‍त वर्ष 2012-13 अवसंरचना के लक्ष्‍यों को अंतिम रूप देने के लिए आयोजित बैठक में प्रधानमंत्री डॉमनमोहन सिंह के  अनुसार पिछले आठ वर्षों के दौरान आकर्षक उच्‍च वृद्धि दर प्राप्‍त करने और विश्‍व में दूसरी सबसे तेज बढती बडी अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में उभरने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था अब अत्‍यधिक मुश्किल दौर से गुजर रही है ! चारों तरफ यूरोजोन चिंता का कारण बना हुआ है ! घरेलू स्‍तर पर बढती मांग के साथ-साथ आपूर्ति पक्ष में मौजूदा अवरोधकों के कारण महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है !  इन सभी कारकों के कारण एक विकट आर्थिक चुनौती है !   हालाँकि पिछले वर्ष औद्योगिक चैंबर पीएचडीसीसीआई के पूर्व जनरल सेक्रेटरी कृष्ण कालरा का कहना है आर्थिक मंदी की मार ज्यदा भारत पर ना पड़े इसलिए  सरकार को मांग में बढ़ोत्तरी करने के साथ - साथ अपने घरेलू बाजार को ज्यादा मजबूत बनाना चाहिए !  महंगाई को कम करके औद्योगिक उत्पादन की दर को बढ़ाना होगा ! साथ ही यूरोपीय देशों को छोड़कर भारत को अब अपने पड़ोसी देशों और अन्य देशों के बाजारों की तरफ आयात की गाड़ी मोड़नी होगी ! अगर भारत ऐसा कर पाया तो निश्चित तौर पर इस मंदी का सही तरीके से  केवल हम मुकाबला कर पाएंगे बल्कि अपनी ग्रोथ रेट को भी तर्कसंगत स्तर पर भी रख पाएंगें ! 

वर्तमान सरकार को चलाने की डोर जाने माने अर्थशास्त्रियों के हाथ में है ऐसा कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं है ! एक तरफ जहा प्रधानमंत्री और मोंटेक सिंह अहलूवालिया दुनिया के जाने - माने अर्थशास्त्री है तो वही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी भी 1986 में यूरोमनी द्वारा दुनिया के सर्वोत्तम वित्त मंत्री के रूप में सम्मान प्राप्त कर चुके है ! अतः भारत की जनता  इनसे आर्थिक सुधार के मुद्दों पर कुछ करिश्माई जरूरी कदम लेने की आस से देखती  थी ! भारत की अर्थव्यवस्था की ऐसी हालत की आहट कई दिनों पूर्व ही रेटिंग एजेंसियों ने दे दी थी ! गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैडर्ड एंड पूअर्स ने राजकोषीय घाटे की बिगडती स्थिति तथा नीति-निर्णय के स्तर पर चलते राजनीतिक दिशाहीनता को देखते हुए भारत की रेटिंग को नकारात्मक कर दिया था ! इतना ही नहीं एक अन्य रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की ख़राब होती अर्थव्यवस्था के लिए श्री मनमोहन सिंह को ही जिम्मेदार ठहराया था ! इन एजेंसिया की विश्वव्यापी इतनी बड़ी साख है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनकी रिपोर्टो के आधार पर ही विदेशी अन्य देशो में निवेश करते है !

हालाँकि 9 प्रतिशत की विकास दर के लिए इस वित्त वर्ष में सरकार ने ढांचागत क्षेत्र में 2 लाख करोड़ रूपये के निवेश का लक्ष्य रखा है ! गौरतलब है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख डॉ. चक्रवर्ती रंगराजन पहले ही कह चुके हैं कि भारत को गरीबी से बाहर निकालना है तो उसे हर साल पर्सेंट की ग्रोथ रेट हासिल करनी होगी ! ऐसा करने से बाज़ार में रौनक लौटेगी ! बाज़ार में नौकरियों के ज्यादा अवसर पैदा होंगे और गरीबी कम करने में मदद मिलेगी !  सरकार आम आदमी के साथ खडी दिखे जिसके दम पर वो सत्ता में आई थी ! परन्तु यह सब तभी संभव होगा जब पेट्रोलियम मंत्रालय और योजना आयोग अपनी जगहंसाई वाले ऐसे कृत्यों से बाज आये ! गौरतलब है अभी हाल में ही पेट्रोल की कीमतों में  एकाएक 7 .5 रूपये की वृद्धि कर दी गयी जिसके चलते पूरे देश में इस फैसले के विरोध में आम जनता सडको पर उतरी थी ! अन्यथा वो दिन दूर नहीं कि इस सरकार का वैसा ही ह्र्स्न होगा जो अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के चुनाव में हुआ था ! ध्यान देने योग्य है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में हुई हार की समीक्षा के लिए कांग्रेस द्वारा बनाई गयी कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार जिम्मेदार कारणों में से मंहगाई के साथ - साथ एक प्रमुख कारण नेताओ की बेजुबानी भी था ! कही ऐसा ना हो कि आगामी लोकसभा चुनाव में सरकार की फिजूलखर्ची भी एक मुद्दा बन जाये इसलिए सरकार को अभी से ऐसे कृत्यों पर रोक लगानी होगी !    

राजीव गुप्ता , स्वतंत्र पत्रकार , 9811558925

Monday, 30 January 2012

'पत्रकारिता का बदलता स्वरुप और न्यू मीडिया'. अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी / Internatnional Conference on Changes Trends in Journalism and New Media




















मित्रों, दिल्ली विश्वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य) द्वारा एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है. यह गोष्ठी 21 मार्च 2012 को होगी.
इस गोष्ठी का विषय है --- 'पत्रकारिता का बदलता स्वरुप और न्यू मीडिया'.
आप सभी से इस संगोष्ठी के लिए आलेख आमंत्रित हैं. 'सोशल मीडिया, वैकल्पिक मीडिया, ब्लॉग और न्यू मीडिया से सम्बंधित अन्य विषयों पर अपने आलेख 29 फरवरी 2012 तक हमें भेज सकते हैं. आलेखों का प्रकाशन पुस्तक रूप में किया जायेगा. अध्यापकों के अतिरिक्त शोधार्थी, पत्रकार और ब्लॉगर भी इस संगोष्ठी के लिए अपने आलेख प्रेषित कर सकते हैं. कुछ चयनित आलेखों के सार को संगोष्ठी के दौरान पदने का अवसर भी दिया जायेगा जिसके उपरांत विशेषज्ञ विद्वान अपने विचार रखेंगे. स्वीकृत आलेखों पर लेखकों को आलेख प्रस्तुतिकरण का प्रमाण पत्र भी दिया जायेगा.

संगोष्ठी के संभावित वक्ताओं में डॉ. अमरनाथ अमर (दूरदर्शन), डॉ. वर्तिका नंदा (मीडिया लेखिका), दिलीप मंडल (न्यू मीडिया विशेषज्ञ), अनीता कपूर (चर्चित ब्लॉगर), प्रो. अशोक मिश्र आदि हैं.
इस संगोष्ठी की सूचना के प्रकाशन के साथ ही हमें कैलिफोर्निया, न्यूजीलैंड और मोरिशस से कुछ मित्रों का आगमन सुनिश्चित हुआ है.
संगोष्ठी में भाग लेने वाले प्रतिभागियों से किसी भी प्रकार का पंजीकरण शुल्क नहीं लिया जायेगा. प्रतिभागियों को अपने रहने और रात्रि भोजन की व्यवस्था स्वयं करनी होगी तथा उन्हें किसी भी प्रकार का मार्गव्यय प्रदान नहीं किया जायेगा.
आपके आलेख drharisharora@gmail.com, davseminar@gmail.com पर भेजे जा सकते हैं. 29 फरवरी, 2012 तक प्राप्त होने वाले आलेखों को पुस्तक में स्थान मिलना संभव हो पायेगा. शेष आलेखों के लिए पुस्तक के पुनर्प्रकाशन पर विचार किया जायेगा.
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें :-
drharisharora@gmail.com
+919811687144
डॉ हरीश अरोड़ा
अध्यक्ष, हिंदी विभाग
पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य)
दिल्ली विश्वविद्यालय
नेहरु नगर, नयी दिल्ली-११००६५

Sunday, 22 January 2012

‘बिन ब्लॉगिंग सब सून’


'ब्लॉग विमर्श' किताब के लिए आलेखों के संकलन का काम जोरों पर है. मन में कुछ विचार उफान रहे थे. उन्हें आलेखबद्ध करने में लगा हूँ. चंद शब्द उस लेख से ........
- डॉ. हरीश अरोड़ा

हर इंसान की यह सोच होती है कि वह अपने विचारों और संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिए कला के किसी-न-किसी माध्यम को आधार बनाए और इसके लिए उसे सबसे सरल और सशक्त माध्यम मिला ‘भाषा’। भाषा ही वह साधन है जो किसी भी मनुष्य को अभिव्यक्ति के लिए एक विराट जगत प्रदान करती है। मनुष्य अनुभूति के क्षणों को जब तक जीता है तब तक वह उसकी निजता का साक्षी रहता है लेकिन जैसे ही वह शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है तब वह उसकी निजता से निकलकर सामाजिक सम्पत्ति बन जाते हैं।
जीवन की पीड़ा को अनुभूत करते हुए उसे शब्दों के आकार देकर साहित्य-सर्जना करने वाले साहित्यकार के लिए तो जैसे उसका साहित्य प्रसव-पीड़ा के बाद के सुखद आनन्द के क्षण का-सा भास देता है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से नवीन सूचना प्रौद्योगिकी ने समाज और समूची जीवन-धारा को प्रभावित किया उससे भला साहित्य और साहित्यकार कैसे अछूते रह सकते थे। इंटरनेट और उसकी दुनिया तो एक आम-आदमी के साथ-साथ साहित्यकार के लिए भी काल्पनिक दुनिया थी। अपनी रचनाओं के प्रशंसकों के लिए उसे पाठकों की तलाश करने की आवश्कता उसे हमेशा रही लेकिन उसने कभी यह न सोचा होगा कि आने वाले कल में उसकी दुनिया प्रकाशक की नहीं वरन् ‘पोस्ट और पेस्ट’ की होगी। उसकी इस तलाश को पूरा किया ब्लॉग (चिट्ठा) ने - जहाँ वह अपनी निजता को अभिव्यंजित करने के लिए अपनी संवेदनाओं और विचारों के शब्दों का डिज़िटलीकरण करता है और ये शब्द उसके ब्लॉग के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के पाठकों तक सहजता से पहुँच जाते। इस तरह देखा जाए तो ब्लॉग निजता की सामाजिक अभिव्यक्ति के डिज़िटल-शाब्दीकरण का एक ऐसा माध्यम है जो सूचनात्मक और सृजनात्मक साहित्य को परम्परागत विधाओं के दबाव से मुक्त करता है और अभिव्यंजित होने के लिए विस्तृत कैनवास देता है। यह निजी डायरी भी है और सार्वजनिक किताब भी। यह सृजन-कर्म भी है और विमर्श भी।
एक समय जब साहित्यकारों और कलाकारों के लिए ‘कॉफी हाऊस कल्चर’ का प्रचलन अपने जोरों पर था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों ने नयी सूचना तकनीकों के आगमन के कारण ‘कॉफी हाऊस कल्चर का प्रचलन हाशिए पर आ गया। उसकी जगह इंटरनेट की सोशल साईट्स ने ले ली। ऐसे में साहित्यकारों के बीच संवादहीनता की स्थिति के चलते उन्हें लगने लगा कि कहीं तकनीक की दुनिया के इस नए सामाजिक क्षेत्र के कारण उनकी दुनिया सीमित न हो जाए, ऐसे में अपने आरम्भिक दौर में इंटरनेट और ब्लॉग लेखन से परहेज करने वाले साहित्यकारों ने इसकी अहमियत को समझा और अपने ब्लॉगों के माध्यम से एक नए समाज और पाठक वर्ग से जुड़ते चले गए। इस तरह ‘काफी हाऊस कल्चर’ की जगह ‘ब्लॉग कल्चर’ ने ले ली। इस ब्लॉग कल्चर का फायदा कला जगत से जुड़े सभी कलाकारों ने उठाया। चाहे वह साहित्यिक ब्लॉगिंग हो, चाहे संगीत ब्लॉगिंग या चित्र ब्लॉगिंग - ‘ब्लॉग कल्चर’ ने सभी को अपने भीतर समेट लिया।
एक समय जिस कलाकार को, चाहे वह कला के किसी भी माध्यम को क्यों न अपनाता हो, उसे अपनी रचनाधर्मिता को समाज तक लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेखकों की पुस्तकों को आम-सामाजिक या पाठक तक पहुँचाने के लिए प्रकाशकों को पुस्तकालयों की खरीद पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में भी उन पुस्तकों के पाठक कौन होंगे और उस पुस्तक पर उनकी प्रतिक्रिया होगी इससे लेखक या प्रकाशक का कोई सीधा-सम्बन्ध नहीं बन पाता था। पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए पत्र-पत्रिकाओं में उनकी आलोचनात्मक-समीक्षाओं के लिए पुस्तकों को भेजना अनिवार्य-सा हो गया था। लेकिन तकनीक की इस नयी कल्चर ने तो जैसे रचनाधर्मियों के लिए विमर्ष का एक नया दायरा खोल दिया। एक आम सामाजिक से लेकर विशेषज्ञों की आलोचनात्मक टिप्पणियों ने तो जैसे एक नई विमर्ष-संस्कृति का निर्माण कर दिया। जिन लेखकों की अभिव्यक्ति सशक्त होने पर भी उन्हें प्रकाशकों का सहारा नहीं मिला वे लेखक भी ब्लॉगिंग की दुनिया के निराला और मुक्तिबोध होने लगे। उन्हें देश ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर भी पाठकीय-प्रतिस्पंदन मिलने लगा। लघु-आलोचना का एक नया दौर शुरू हो गया।
ब्लॉगिंग ने आम-सामाजिक को केवल विचारों को पढ़ने या समझने की सीख ही नहीं दी बल्कि अपनी अभिव्यक्ति के लिए विकसित शब्द-भण्डार से भी परिचित कराया। ब्लॉगिंग के आगमन पर जिन रचनाकारों और भाषाविदों ने भाषा के खतरे को लेकर चिन्ता व्यक्त की वही लोग अब ब्लॉगिंग की इस दुनिया में पंख फैलाकर उसके असीमित आकाश में अपने विचारों और संवेदनाओं को अभिव्यंजित कर रहे हैं। ऐसे लोगों की अभिव्यक्ति ने ही आम-सामाजिक को भाषा-ज्ञान दिया। अब उसके पास भी अपना एक विशाल आकाश था जहाँ उसने अपने भीतर की खुशियों को शब्द-सुमनों से सजाया वहीं अपनी दुःखद अभिव्यंजनाओं पर शब्दों का मरहम भी लगाया।
ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखते ही एक आम-आदमी के लिए तो जैसे अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम हाथ लगा जिसके लिए उसे किसी दबाव की आवश्यकता नहीं थी। वह अपनी संवेदनाओं को स्वयं गढ़ता और ब्लॉग पर चस्पा कर देता। तत्काल प्रतिक्रियाओं ने उसकी रचनाधर्मिता की आलोचना के माध्यम से उसे अपनी कमज़ोरियों को समझने और उन्हें ठीक करने का अवसर दिया। सीखने और सिखाने के लिए इससे बेहतर विकल्प और क्या हो सकता है? दूसरी ओर स्थापित साहित्यकारों के लिए भी यह एक ऐसा माध्यम बन गया कि अब अपनी रचनाओं और भावनाओं के लिए प्रकाशकों के दबाव और रचनाओं के प्रकाशन के संघर्ष से उसे रूबरू नहीं होना पड़ता बल्कि वह स्वयं ही प्रकाशक भी हो गया है और सम्पादक भी। बाज़ार में बैठे प्रकाशकों और सम्पादकों से उसका कोई सरोकार नहीं रहा। निजी और सामूहिक ब्लॉगों के माध्यम से वह अपनी रचनाधर्मिता को एक नया आयाम दे रहा है।
दरअसल पाठकों और लेखकों के बीच सीधा-सम्बन्ध स्थापित करने वाली इस विधा ने समाज के आम-आदमी के साथ-साथ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए ब्लॉगिंग की ओर अग्रसर किया है। अब तो ब्लॉग-ब्रह्म के मंत्र को समझते हुए वे भी कहने को बाध्य हो गए हैं कि ‘बिन ब्लॉगिंग सब सून’। जन-पत्रकारिता और जन-साहित्य (या कहें लोकप्रिय साहित्य) का ऐसा माध्यम जिसने साहित्य और पत्रकारिता दोनों की ही तस्वीर बदल दी है। अगर कहें कि विमर्ष का यह नया आधार आज सबसे सशक्त माध्यम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

Tuesday, 15 November 2011


वर्तमान समय में मीडिया को पांच भागों में विभक्त किया जा सकता है। सर्वप्रथम प्रिंट, दूसरा रेडियो, तीसरा दूरदर्शन, आकाशवाणी और सरकारी पत्र-पत्रिकाएं चौथा इलेक्ट्रानिक यानि टीवी चौनल, और अब पांचवा सोशल मीडिया। मुख्य रूप से वेबसाइट, न्यूज पोर्टल, सिटीजन जर्नलिज्म आधारित वेबसाईट, ईमेल, सोशलनेटवर्किंग वेबसाइटस, फेसबुक, माइक्रो ब्लागिंग साइट टिवटर, ब्लागस, फॉरम, चैट सोशल मीडिया का हिस्सा है। यही मीडिया अभी ‘न्यू मीडिया’ की शक्ल में कई मठाधीशों की नींद चुरा ली है।कथित प्रगतिशील और पाषाणी सोच रखने वाले लेखक, रचनाकार भन्नाए-भन्नाए से दिख रहे हैं।उनकी आँखों की सूरमा में ‘न्यू मीडिया’ ने सेंध मार दिया है। वे इस नई पद्धति के खिलाफ खुल कर आग तो नहीं उगलते लेकिन आग वबूला अवश्य दिखते है। बहरहाल इस मीडिया की ताकत को वीकिलीक्स के रूप में अमरीका और अफ्रीका व मध्यपूर्व के देशों में ‘फेसबुकिया क्रांति’ के रूप में भी देखा जा सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी का नया उद्धोष भी इसी नई मीडिया में देखी जा रही है। मात्र एक दशक में विश्व फलक पर नई सोच और जिम्मेवारी के साथ स्थापित हो रहे न्यू मीडिया पर केन्द्रित वृहत पुस्तक- ‘हिन्दी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रांति’ (पृष्ठ-376, मूल्य- 495/रू0 मात्र) हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर से आयी है।


न्यू मीडिया और विशेषकर ब्लॉगिंग जगत की तमाम अन्तर्वस्तुओं को स्पर्श करती इस पुस्तक में न्यू मीडिया और ब्लॉगिंग के शीर्षस्थ तकनीशियनों, लेखक व समीक्षकों के शोधात्मक आलेख हैं। संभवतः न्यू मीडिया और विशेषकर हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में यह इस तरह का अकेला ग्रंथ अथवा दस्तावेज है जो हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा को समग्रता के साथ प्रस्तुत करती है।


प्रस्तुत पुस्तक में – ब्लॉगिंग क्या है, ब्लॉगिंग का इतिहास, कैसे जुड़े ब्लॉगिंग से, मसहूर ब्लॉग, ब्लॉगिंग से कमाई आदि विषयों पर समग्रता से प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के संपादक व लेखक- अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात स्वंय भी चर्चित ब्लॉगर हैं। इनके अनेकाने पोस्ट एग्रीगेटरों पर प्रत्येक दिन दिखते हैं। ब्लॉग जगत के इन चर्चित खटरागियों ने हिन्दी ब्लॉगिंग को जन-जन तक पहूँचाने का मुहिम चलाया है। इसी कड़ी में यह पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रांति’ के माध्यम से सर्वप्रथम इन्होंने विश्व भर में फैले हिन्दी ब्लोगरों को एकजुट किया तथा शीर्षस्थ ब्लॉगरों यथा- रवि रतलामी, बालेंदु शर्मा दधीच, शैलेश भारतवासी, पूर्णिमा वर्मन, ज्ञानदत्त पाण्डेय, बी एस पावला, शास्त्री जे सी फिलीप, अनुप शुक्ल, रूपचंद्र शास्त्री, रणधीर सिंह ‘सुमन’, चंडीदत्त शुक्ल, प्रेम जनविजय, समीरलाल समीर आदि को इस पुस्तक में शामिल कर पुस्तक की सार्थकता को पुष्ट किया। पुस्तक को कई खंडों में विभक्त किया गया है। तकनीकी खंड में तेरह लेखक शामिल हैं। इसमें हिन्दी ब्लॉगिंग की तकनीकी पहलू मसलन् यूनिकोड टाइपिंग, वॉयस ब्लॉगिंग जैसे महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा है। शैलश भारतवासी हिन्दी ब्लॉगिंग के तकनीकी पहलू से अवगत कराते हुए लिखतें कि ‘इलेक्ट्रोनिक इंजीनियरिंग का यह अविष्कार मनुष्य का सबसे बढ़िया दोस्त बनकर आया है’। पुस्तक में ‘ब्लॉग प्रसंग’ के अन्तर्गत सिद्धेश्वर सिंह, सुरेश यादव, पवन चंदन और केवल राम के आलेख सम्मलित हैं। केवल राम ने अपने आलेख ‘हिन्दी ब्लॉगिंग रचनात्मक अभिव्यक्ति के विविध आयाम’ में लिखा हैं कि ‘हिन्दी ब्लॉगिंग आज व्यक्तिगत बातों के दौर से गुजरकर विमर्श के दौर में प्रवेश कर चुकी है। यहाँ पर रचनात्मक विविधता के इतने आयाम मिल जाते हैं जो साहित्य और रचनात्मकता के लिए सुखद है’। सुरेश यादव ब्लॉग और नेट पर उपलब्ध गंभीर साहित्यिक पन्नों की चर्चा करते हैं – अनुभूति, अभिव्यक्ति, कविता कोश, हिन्दी समय, हिन्द युग्म सहित काव्यम्, वाटिका, लघुकथा डॉट काम, भाषा-सेतु, जनशब्द, आखर कलश और अपनी माटी सदृश्य साहित्यिक हब हिन्दी ब्लॉगिंग में चार चांद लगाते हैं।


पुस्तक में संचार खंड में छः महत्वपूर्ण आलेख सम्मलित हैं । खुशदीप सहगल सक्रिय व चौकन्ने ब्लॉगरों में शामिल हैं उन्होंने ‘ब्लॉगिंग की ताकत’ को रेखांकित किया है, उनका कहना है- ब्लॉग के माध्यम से दुनिया में जहाँ कहीं भी भारतवंशी हैं, एक बडे़ परिवार की तरह जुड़ गए हैं।… वे न सिर्फ अपने शहर, अपने राज्य, अपने देश से हर वक्त संपर्क में रहते हैं, बल्कि हिन्दी का पूरी दुनिया में जोर-शोर से प्रसार भी कर रहे हैं’। पुस्तक में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी लिखते हैं कि ‘ब्लॉगों की लोकप्रियता और अंतर्जाल से जुड़े प्रवुद्धवर्ग के लिए इसकी सहजता और सरलता ने प्रिंट माध्यम में इसकी चर्चा को अपरिहार्य बना दिया है। प्रायः सभी अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रकाशित होने वाली रोचक और ज्ञानवर्द्धक जानकारी को अपने पृष्ठों पर प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं…. साहित्य के क्षेत्र में भी तकनीक और साधन ने युगांतकारी परिवर्तन किए हैं लेखनी के प्रयोग से पहले स्त्रुति-परंपरा, फिर हस्तलेखन हेतु भोजपत्र, कागज, पांडुलिपि फिर छपाई-मशीन, पुस्तकों और अखबारों का प्रकाशन, कंप्युटर और इंटरनेट के क्रमिक विकास ने साहित्य के सृजन, अध्ययन-अध्यापन व आस्वादन की रीति को लगातार बदला है।’


पुस्तक के विमर्श खंड में अजित राय, शिखा वार्ष्णेय, ललित शर्मा, प्रतीक पांडे, अखिलेख शुक्ल, रश्मि प्रभा, पद्म सिंह, फौजिया रियाज और सुभाष राय जैसे तीस ब्लागरों की भागीदारी है। यहाँ प्रमोद तांबट के महत्वपूर्ण विचार दृष्टव्य है- ‘बाजारवाद के इस निर्मम दौर में जब लोकतंत्र का चौथा खंभा कही जाने वाली पत्रकारिता और मीडियामंडी बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के हाथों की कठपुतली बनी, दंभपूर्ण बुद्धिजीविता के शिकार पत्रकार-मीडिया पुरुषों से घिरी हुई है, ब्लॉग जगत मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों के बीच एक किस्म के लोकतांत्रिक स्तंभ के रूप में सामने आने की कोशीश कर रहा है। इसे निस्संदेह पाँचवा खंभे की उपमा दी जा सकती है।’ इसे वैकल्पिक मीडिया का नया अवतार मानते हुए अजित राय ने लिखा है कि- सुप्रसिद्ध विचारक नोन चाम्सकी ने एक बार कहा था कि पूँजी और सत्ता के जनविरोधी दौर में प्रौद्योगिकी आम आदमी के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है। मिशेल फुकोयामा ने जब ‘इतिहास के अंत’ घोषित किया और दुनिया-भर में जबरस्त बहस छिड़ी, ठीक उसी दौर में अखबार, रेडियो और दूरदर्शन जैसे पारंपरिक जनसंचार माध्यमों के बरक्स वैकल्पिक मीडिया के रूप में इंटरनेट का अवतार हुआ। आज हम विकीलिक्स का प्रभाव देख चुके हैं, जिसने अमरिका की समर्थ सत्ता को हिलाकर रख दिया। मोबाइल की प्रौद्योगिकी ने भारतीय समाज में अभिव्यक्ति की आजादी का जो नया उद्घोष किया था, उसका विस्तार हमें इंटरनेट के साइबर स्पेश में दिखाई देता है। हमारे देखते-ही-देखते संपादकों और जनसंचार-माध्यमों के मालिकों का एकाधिकार खत्म हो गया और हममें से हर कोई अपनी-अपनी पत्रिका निकालने की आजादी का खेल खेलने लगा।’ लंदन में रहने वाली शिखा वार्ष्णेय कहती है कि ‘आज घर में बैठी गृहणी दिनचर्या से ऊबकर कुढ़ती नहीं, बल्कि अपनी भावनओं और विचारों को सुंदर शब्दों में ढालकर ब्लॉग पर लिखती है। फिलहाल एफएम रेनबो से जुड़ी रेडियो जौकी फौजिया रियाज का मानना है कि – दरअसल, ब्लॉगिंग की ओर आपका रूझान बढ़ाने में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह होता है कि आपको कितने लोग पढ़ रहे हैं। फॉलोअरों की संख्या, कमेंट्स की शैली आपका हौसला बढ़ाते हैं। आपको विश्वास दिलाते हैं कि आपका लिखा महत्वपूर्ण है। दैनिक अमर उजाला के नोएडा कार्यालय मे संपादकीय विभाग में कार्यरत उमाशंकर मिश्र लॉगिंग पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि हिन्दी, अंग्रजी समेत कई क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों में ब्लॉगिंग पर आधारित नियमित स्तंभ छप रहे हैं, इलाहाबाद विश्वविधालय और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविधालय, वर्धा जैसे ख्यातिप्राप्त अकादमिक स्थान अब ब्लॉगिंग जैसे विषय पर ब्लॉगरों को बुलाकर परिचर्चाएँ आयोजित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मीडिया के शोधार्थी भी अब ब्लॉगिंग की उपयोगिता और प्रभाव को ध्यान में रख कर शोध करने में जुटे हुए हैं। ब्लॉग की नित नई खिड़कियाँ खुल रही है। देश-विदेश में बैठे ब्लॉगर साहित्यिक , सांस्कृतिक, सामाजिक, पारंपरिक, कला, मनोविज्ञान, आयुर्वेद, शिक्षा, रोजगार, वैश्विकरण और पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपने-अपने ब्लॉग के माध्यम से परस्पर संवाद कर रहे हैं। यहाँ सेंसर की कैंची नहीं है…। सी. वी . न्यूज नेटवर्क में हिन्दी सेक्सन के प्रभारी उमेश चतुर्वेदी का मानना है कि हिन्दी में ज्यादातर ब्लॉगर अपनी वैचारिक भूख और कसक को अभिव्यक्त करने आये तो हैं, लेकिन ज्यादातर की भाषाई संस्कार बेहद कमजोर है। इसने ब्लॉगिंग के स्वाद को बेहद कड़वा बनाया है। लखनऊ प्रकाशित दैनिक जनसंदेश टाइम्स के मुख्य संपादक डा. सुभाष राय का मानना है कि ‘अगर ब्लॉग-लेखन की अर्थपूर्ण स्वाधीनता अपनी पूरी ताकत के साथ सामने आती है तो वह लोकतंत्र के पाँचवे स्तंभ की तरह खड़ी हो सकती है। जिम्मेदारियाँ बड़ी है, इसलिए हमसब को मनोरंजन, सतही लेखन और शब्दिक नंगपन से मुक्त होकर वक्त के सरोकार और मनुष्यता के प्रति प्रतिवद्धता के साथ आगे आकर अग्रिम मोर्चे में खुली जगह ले लेनी है।


इस पुस्तक के विश्लेषण खंड में चार महत्वपूर्ण आलेख यथा रवीन्द्र प्रभात का – हिन्दी ब्लॉगिंग में महिलाओं की स्थिति। बालेंदु शर्मा दाधीच का- ब्लॉगिंगः ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति । आकांक्षा यादव का हिंदी -ब्लॉगिंग का तेजी से बढ़ता सृजनात्मक दायरा एवं चंडीदंत्त शुक्ल का – नेट से पहचान और भी है। माइक्रोसॉफ्ट की ओर से ‘मोंस्ट वेल्युएबल प्रोफेशनल’ करार दिए गये बालेन्दु शर्मा दाधीच ने अपने आलेख में लिखा है कि ‘ ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम , जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, राजनीतिक -सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वंतंत्र है। जहाँ अभिव्यक्ति न कायदों में बँधने को मजबूर है, न अलकायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ब्लॉगिंग अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गयी है। आकांक्षा यादव अपने आलेख में लिखती हैं कि ब्लॉगिंग का क्रेज पूरे विश्व में छाया हुआ है। अमेरिका में सवा तीन कारोड़ से ज्यादा लोग नियमित ब्लॉगिंग से जुड़े हुए हैं, जो वहाँ के मतदाताओं का 20 फीसदी है। इसकी महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2008 में सम्पन्न अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान इस हेतु 1494 नए ब्लॉग आरंभ किए गए। जापान में हर दूसरे व्यक्ति का अपना ब्लॉग है…फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी और उनकी पत्नी कार्ला ब्रूनी से लेकर ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद तक शामिल हैं।


संस्मरण खंड पुस्तक का एक महत्वपूर्ण अध्याय है यहाँ ज्ञानदत्त पांडेय, अनूप शुक्ल, जाकिर अली ‘रजनीश’ और रचना त्रिपाठी इस खंड में सम्मलित हैं यहाँ ब्लॉगिंग से जुडी महत्वपूर्ण प्रसंगों को रखा गया है। पुस्तक के साक्षात्कार खंड में प्रिंट और ब्लागिंग जगत के कई चर्चित चेहरे शामिल किये गये हैं जैसे दिविक रमेश, प्रेम जनमेजय, समीरलाल समीर, रवि रतलामी, जी के अवधिया, अलबेला खत्री, अविनाश वाचस्पति, अमरजीत कौर, गौहर राजा, कुष्णबिहारी मिश्र, अंबरीश अंबर, शकील सिद्दीकी और सुषमा सिंह के साक्षात्कार इस ग्रंथ पठनीय के साथ-साथ संग्रहणीय भी बना दिया है। पुस्तक में हिन्दी ब्लॉगिंग को पहचान देने वाले यशवंत सिंह (भड़ास) और अविनाश (मुहल्ला) सदृश्य कुछ शख्सियातों की अनुपस्थिति खलती अवश्य है बावजूद इसके संपदकीय में इस बात का खुलासा दृष्टव्य है कि मात्र एक महीने की सीमित अवधि में पुस्तक का संपादन और मुद्रण आदि सभी कार्य किये गये हैं।


प्रकाशक डा. गिरिराजशरण अग्रवाल के यह विचार भी दीगर हैं कि‘परिवर्तन सृष्टि का नियम है। पिछले कुछ वर्षों से छपी सामग्री पर संकट की बात बहुत जोर से की गयी है, लेकिन मैं इससे कभी विचलित नहीं हुआ हूँ… मेरे मन में यह सहज जिज्ञासा पनप रही थी कि अभिव्यक्ति के नए और तेजी से सशक्त हो रहे माध्यम ‘हिंदी ब्लॉगिंग’ पर एक पुस्तक का प्रकाशन किया जाए, जो हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा को पूरी समग्रता के साथ आयामित कर सके।


संपादक अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात के भगीरथ प्रयास का यह फल है कि हिन्दी में ब्लॉगिंग विषयक यह मानक ग्रंथ सामने आया। संपादक द्वय को साधुवाद है।

समीक्षक : अरविन्द श्रीवास्तव
कला कुटीर, अशेष मार्ग
मधेपुरा- 852113. बिहार
मोबाइल- 09431080862.

e.mail- arvindsrivastava39@gmail.com

Monday, 7 November 2011


मेरी पुस्तक जनसंचार का चौथा संस्करण प्रकाशित होकर आ गया है। यह पुस्तक पिछले पांच वर्षों में लगातार अपनी पहचान पत्रकारिता के विद्यार्थियों, अध्यापकों और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय बनी हुयी है। देश के सभी पत्रकारिता विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में इसका स्वागत हुआ है। इस पुस्तक को प्राप्त करने के लिए आप संपर्क कर सकते हैं :
युवा साहित्य चेतना मंडल
एन-२३ श्री निवास पुरी
नयी दिल्ली-११००६५
०९९६८७२३२२२

Monday, 28 February 2011

बदलते समाज की मिटती खूबसूरती को बचाने के लिए जरूरी है वैकल्पिक मीडिया।''


''बदलती परिस्थितियों के कारण बदलते समाज की मिटती खूबसूरती को मिटने से बचाने के लिए जरूरी है वैकल्पिक मीडिया।'' ये शब्द दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. गोपेश्‍वर सिंह ने पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य) द्वारा ग्लोबल मीडिया और हिन्दी पत्रकारिताविषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर व्‍यक्‍त किए। प्रो. सिंह ने इस अवसर पर कहा कि बदलते समय के साथ समाज की मानसिकता बदले और मीडिया की मानसिकता न बदले, यह हो ही नहीं सकता। लेकिन मीडिया की बदलती मानसिकता ने हिन्दी पत्रकारिता के पुराने आदर्शों और संघर्षों की खूबसूरती को मिटाने में अपनी जो भूमिका निभाई उससे बचे रहने के लिए वैकल्पिक मीडिया ही एकमात्र उपाय है।
दिल्ली विश्‍वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य) द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी का उद्घाटन पूर्व प्राचार्य प्रो. मोहन लाल,प्रो. गोपेश्‍वर सिंह तथा सुधांशु रंजन द्वारा किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. मोहन लाल ने हिन्दी पत्रकारिता की मिशनरी भावना के जज्‍बे के ध्‍वस्‍त होने के लिए बाज़ारवाद को दोषी ठहराया। संगोष्ठी के प्रथम सत्र में प्रसिद्ध पत्रकार धीरज कुमार ने आम आदमी की पत्रकारिता और वैकल्पिक मीडियाविषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि बाज़ार के कारण ही आज का पत्रकार निष्पक्ष नहीं रह पाता। लेकिन आम आदमी की इस पत्रकारिता के क्षरण होने के साथ-साथ उसके लिए वैकल्पिक मीडिया के लिए हिन्‍दी ब्लॉगिंग, फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल वेबस्‍पेस साइटों ने बेहतर माध्यम के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तिका नन्दा ने उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इन सोशल नेटवर्किंग साईट्स ने आम आदमी की संवेदनाओं और भावनाओं के सुख को फिर से जागृत किया है। उनके अनुसार मीडिया ने अपनी ताकत नहीं खोई बल्कि इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण पुन: संजोई है और अब नया मीडिया और आम आदमी दोनों ही ताकतवर होते जा रहे हैं। प्रथम सत्र के अध्यक्ष प्रो. दुर्गाप्रसाद गुप्त के अनुसार ग्लोबल मीडिया ने हमारी ज़िन्दगी को बदल दिया है और बाज़ार के दबाव में राष्‍ट्र में असहमति की आवाज़ को दबाने के लिए ही पत्रकारिता का चरित्र बदलकर हाजिर हुआ है।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में डॉ. हरीश अरोड़ा ने बाज़ार का छद्म यथार्थ और मूल्यहीन पत्रकारिताविषय का प्रवर्त्तन करते हुए कहा किआज़ादी से पहले जिन मूल्यों की तलाश में आम आदमी ने संघर्ष किया, वही मूल्‍य आज़ादी के बाद और अधिक विघटित हो गए हैं। ऐसे में आम आदमी के पास अपनी बात को कहने के विकल्प नहीं रहा था परंतु अब आम आदमी के पास तकनीक आने के बाद उसने अपने लिए विकल्पों की स्वयं ही खोज की। उसने तकनीक को ही अपनी आवाज़ और अभिव्यक्ति का हथियार बनाया।इस विषय पर बोलते हुए डॉ. लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि भारत में आज भी बाज़ार के छद्म यथार्थ के हिन्दी पत्रकारिता पर प्रभाव के कारण ही नहीं, कहीं न कहीं बाज़ार के अलावा कुछ युवा पत्रकार भी इस हिन्दी पत्रकारिता को संवेदनहीन बनाने के दोषी हैं लेकिन इसके बावजूद भी दूरदर्शन और आकाशवाणी अब भी मूल्यों को बचाए रखने वाली पत्रकारिता का हिस्सा बने हुए हैं।डॉ. अमरनाथ अमर ने माना कि दूरदर्शन ने सामाजिक मुद्दों और अन्य वैचारिकों विषयों पर विमर्श लिए अनेक कार्यक्रमों का निर्माण किया है और आज भी कर रहा है। जरूरत है कि समाज अपनी आगे आने वाली पीढ़ी को इन कार्यक्रमों के साथ जोड़े और नए भविष्य के निर्माण में बाज़ारवाद के आगे नत मीडिया से बचकर मूल्यवादी पत्रकारिता के मीडिया का आधार दे सकें। इस सत्र के अध्यक्ष प्रसिद्ध पत्रकार और राजनीति विश्‍लेषक डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने अपने विचार रखते हुए कहा कि पेड न्यूज़ बाज़ारवाद और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। अखबार के अंतकरण का स्‍वामी, आज पैसे लेकर खबर छापता है,केवट पैसे लेकर पार उतारता है, यह बाज़ारीकरण की पराकाष्ठा है। हिन्दी पत्रकारिता कभी व्रत हुआ करती थी, अब वह वृत्ति बन गई है और इसमें वृत्ति की विकृतियाँ भी आ रही हैं। पत्रकारिता को पावन करने के‍ लिए पहले स्‍वयं पवित्र होना होगा, प्रशासन को शुद्ध करना होगा।
संगोष्ठी के दूसरे दिन तीसरे सत्र वेब जगत का हस्तक्षेप और हिन्दी पत्रकारिता में संरचनात्मक परिवर्तनविषय पर बोलते हुए प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार ने कहा कि बाज़ार के इस दौर में हिन्दी पत्रकारिता को यदि अन्य भाषाओं की पत्रकारिता का मुकाबला करना है तो निश्चित रूप से उसे आम आदमी की भाषा में अपनी बात कहनी होगी। इस मामले में वेब माध्यम ने आम आदमी को अपनी भाषा में कहने की छूट दी। इस सम्बन्ध में चर्चित सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर और मशहूर व्‍यंग्‍यकार अविनाश वाचस्पति ने वेब जगत को अथाह समुद्र की संज्ञा देते हुए कहा कि हिन्‍दी ब्लॉगिंग और सोशल नेटवर्किंग भारत में अभी आरम्भिक दौर में है। छात्रों के साथ जोड़कर इसे आम समाज तक पहुँचाकर ही हिन्दी भाषा की संरचना को सुदृढ़ किया जा सकता है। इस सत्र के अध्यक्ष अविनाश दास ने कहा कि वेब जगत को अभिव्यक्ति के खतरों को उठाने की आज़ादी मिलने के कारण नागरिकों की सशक्त विधा के तौर पर स्वीकार किया गया है।
संगोष्ठी के चौथे सत्र में वैश्विक समस्याएं, ग्लोबल संस्कृति और हिन्दी पत्रकारिताविषय पर अनंत विजय ने कहा कि बाज़ारवाद के चलते ही सही, लेकिन तकनीक ने हमें सुविधाएं दी हैं, हमें उनके साथ-साथ बाज़ार को भी स्वीकार करना होगा। विश्‍व की समस्याएं अब हिन्दी पत्रकारिता का हिस्सा बन गई हैं।इस अवसर पर बोलते हुए गीताश्री ने माना कि विश्‍व की समस्याओं के साथ-साथ उसकी संस्कृति ने भी भारत की संस्कृति को बदला है, जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए। बदलते विश्‍व के साथ हमारी संस्कृति का बदलना बहुत जरूरी है।इस सत्र के अध्यक्ष प्रो. हरिमोहन ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हम अपनी संस्कृति के बारे में अनभिज्ञ होने के कारण ही बदलती हुई संस्कृति से परेशान हैं। लेकिन इस बदलाव के कारण हिन्दी पत्रकारिता में आए बदलाव को हमें सकारात्मक तरीके से स्‍वीकारना होगा। जिसके लिए जरूरी है कि पत्रकारिता के विश्‍वविद्यालय उसकी फैक्ट्री न बनें और हिन्दी पत्रकारिता को बदलते समय की माँग के अनुरूप ही बदलें।
संगोष्ठी के अंत में संयोजक डॉ. हरीश अरोड़ा ने सभी आमंत्रित वक्ताओं, अध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पत्रकारों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि हिन्दी पत्रकारिता ने बदलते हुए समय के साथ जो नया स्वरूप धारण किया है और बाज़ार के चलते उसने अपने आपको स्वयं ही बदल लिया है, उसके इस बदलाव को हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। साथ ही हिन्दी पत्रकारिता में बैठे हुए अभिमन्युओं को पहचानकर हिन्दी पत्रकारिता की मूल्यवादी परम्परा को बचाए रखना होगा।संगोष्ठी में डॉ. सुरेशचन्द्र गुप्त, डॉ. उमेशचन्द्र गुप्त, डॉ. रुक्मिणी, डॉ. राजकुमारी पाण्डेय, डॉ. ओंकार लाल मीणा, डॉ. आशा रानी,डॉ. अनिलकुमार सिंह, डॉ. अनिरुद्ध, डॉ. डिम्पल, डॉ. विभा, डॉ. अनिल, डॉ. पुनीत चाँदला, डॉ. राजेश राव आदि अध्यापकों के सहयोग के लिए संयोजक ने उनका धन्यवाद किया। खचाखच भरा सभागार नये मीडिया की शक्ति का साक्षी बना।

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